Tuesday, October 4, 2011

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो

आज सकाळ पासून  वातावरण जरा ढगाळ होत..
माझ मनही जरा खिन्न होत ..
त्यात एक गाण कानावर पडल ..

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो ।।धृ।।
न मैं तुम से कोई उम्मीद रख्खूं दिलनवाजी की
न तुम मेरी तरफ देखो गलत-अंदाज नजरों से 
न मेरे दिल की धडकन लडखडाए मेरी बातों मे 
न जाहिर हो तुम्हारी कश्‍मकश का राज नजरों से ।।1।।

तुम्हे भी कोई उलझन रोकती है पैश-कदमी से 
मुझे भी लोग कहते है कि ये जलवे पराए है 
मेरे हमराह भी रुसवाइयां3 है मेरे माजी की
तुम्हारे साथ भी गुजरी हुई रातों के साए है ।।2।।

तारुफ़  रोग हो जाए तो उस को भूलना बेहतर
ताल्लुक बोझ बन जाए तो उसको तोडना अच्छा
वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक खूबसूरत मोड दे कर छोडना अच्छा ।।3।।

चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनो ।

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